अलीगंज हनुमान मंदिर : आस्था, इतिहास और गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत प्रतीक

लखनऊ का अलीगंज हनुमान मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह शहर की साझा संस्कृति, विश्वास और लोककथाओं का जीवित दस्तावेज़ है। कभी लक्ष्मणपुर कहलाने वाली इस भूमि पर, गोमती नदी के पुराने प्रवाह के किनारे स्थित यह मंदिर सदियों से श्रद्धा का केंद्र रहा है। खास बात यह है कि इसकी मान्यता और परंपराओं में हिंदू, मुसलमान और ईसाई—तीनों समुदायों की सहभागिता दिखाई देती है, जो लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब को और भी उजागर करती है।

अलीगंज का नाम और मंदिर की पृष्ठभूमि

19वीं शताब्दी के आरंभ में इस क्षेत्र को आलिया बेगम—नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी और नवाब वाजिद अली शाह की दादी—द्वारा बसाया गया। उन्हीं के नाम पर यह इलाका अलीगंज कहलाया। इसी मोहल्ले में स्थित हनुमान मंदिर आगे चलकर “बड़े मंगल” के मेले के लिए प्रसिद्ध हुआ, जो लखनऊ के सबसे बड़े और श्रद्धापूर्ण आयोजनों में गिना जाता है।

रामायण काल से जुड़ी लोकमान्यताएँ

लोककथाओं के अनुसार, रामायण काल में जब श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमान, माता सीता को बिठूर (वाल्मीकि आश्रम) ले जा रहे थे, तब अंधेरा होने पर वे वर्तमान अलीगंज के पास रुके। लक्ष्मण आगे की चौकी तक जाना चाहते थे, लेकिन सीता ने किसी राजभवन में रुकने से इनकार कर दिया। कहा जाता है कि उसी बाग में सीता रुकीं और हनुमान जी ने पूरी रात उनकी रक्षा की। कालांतर में उसी स्थान पर एक मंदिर बना, जिसे हनुमान बाड़ी कहा गया। 14वीं शताब्दी में इसका नाम इस्लामबाड़ी पड़ा—जो आज भी प्रचलित है।

मूर्ति की पुनःस्थापना और चमत्कारी घटना

18वीं शताब्दी के अंत में अवध के नवाब मुहम्मद अली शाह की बेगम रबिया संतान न होने से व्याकुल थीं। इस्लामबाड़ी में दुआ के बाद उनकी कामना पूर्ण हुई। मान्यता है कि गर्भावस्था में उन्हें स्वप्न हुआ—जिसमें गर्भस्थ शिशु ने बताया कि इस्लामबाड़ी में हनुमान जी की मूर्ति गड़ी है। मूर्ति निकाली गई और उसे हाथी पर बैठाकर इमामबाड़े के पास प्रतिष्ठित करने ले जाया गया।
लेकिन जब जुलूस अलीगंज के अंतिम छोर पर पहुँचा, हाथी आगे बढ़ने से अड़ गया। संतों ने कहा—हनुमान जी गोमती के उस पार नहीं जाना चाहते। तब वहीं, गोमती तट के पास मूर्ति स्थापित की गई और मंदिर का निर्माण हुआ। आसपास की भूमि महमूदाबाद रियासत ने दान में दी।

बड़े मंगल की शुरुआत

मंदिर स्थापना के कुछ वर्षों बाद इलाके में प्लेग फैला। लोग पुराने मंदिर में शरण लेने लगे। किंवदंती है कि पुजारी को स्वप्न में हनुमान जी ने निर्देश दिया—नए मंदिर में आओ, वहीं मेरी शक्ति है। लोग वहाँ पहुँचे और अनेक रोगमुक्त हुए। यहीं से बड़े मंगल के मेले की परंपरा शुरू मानी जाती है।
एक अन्य कथा में आलिया बेगम के रोगमुक्त होने के बाद भव्य उत्सव और खैरात का वर्णन मिलता है—जिससे मेले को और प्रतिष्ठा मिली।

व्यापारी जटमल और मंदिर का विस्तार

नवाब वाजिद अली शाह के समय मारवाड़ी व्यापारी जटमल की केसर-कस्तूरी नहीं बिक रही थी। निराश होकर उसने मंदिर में मनौती मानी। संयोग से कैसरबाग निर्माण में उसकी कस्तूरी खरीदी गई। कृतज्ञ जटमल ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया—आज का गुंबद और मूर्ति पर छत्र उसी की देन माने जाते हैं।

आज का अलीगंज हनुमान मंदिर

आज भी ज्येष्ठ मास के हर मंगलवार को यहाँ बड़े मंगल का अद्भुत दृश्य होता है—दूर-दूर से आए श्रद्धालु दंडवत परिक्रमा करते हैं, प्रसाद पाते हैं और मनौतियाँ मानते हैं। मान्यता है कि नए हनुमान मंदिरों की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक सामग्री यहीं से ली जाए तो स्थापना प्रमाणित मानी जाती है।

निष्कर्ष
अलीगंज हनुमान मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि आस्था, करुणा और साझी विरासत का प्रतीक है। यहाँ इतिहास, लोककथाएँ और मानवता—तीनों एक साथ सांस लेते हैं। यही वजह है कि सदियों बाद भी यह मंदिर लखनऊ की आत्मा में धड़कता है।

Leave a Comment